सन्नाटों की अधीनता पता नहीं क्यों अच्छी लगती है|
तिमिर का बियावान पता नहीं क्यों अच्छा लगता है|
हर रिश्ता हर व्यवहार लगता है एक छलावा |
सिर्फ अपनी परछाई का साथ पता नहीं क्यों अच्छा लगता है |
नहीं चाहिए सहारा किसी के कंधो का,
टूटी कश्तियो से समंदर करना पार, पता नहीं क्यों अच्छा लगता है|
भीड़ नहीं लगती है मुझे लुभावनी या चित्ताकर्षक,
सिर्फ रात्रि का नीरव श्रृंगार, पता नहीं क्यों अच्छा लगता है|
मुखोटे ओढ़े लोगो की हंसी मुझे नहीं है भाती,
गरीब असहायों का करुण रुदन, पता नहीं क्यों अच्छा लगता है|
बहुत ऊपर उठने की मुझे अब चाह नहीं,
अगर अपने साथ खुद की आत्मा को उठा लू तो अच्छा लगता है|
कलियुग की माया मेरे हृदय पर कुछ असर नहीं करती,
अगर कलियुग के लोगो में मानवता जगा दू तो अच्छा लगता है||
तिमिर का बियावान पता नहीं क्यों अच्छा लगता है|
हर रिश्ता हर व्यवहार लगता है एक छलावा |
सिर्फ अपनी परछाई का साथ पता नहीं क्यों अच्छा लगता है |
नहीं चाहिए सहारा किसी के कंधो का,
टूटी कश्तियो से समंदर करना पार, पता नहीं क्यों अच्छा लगता है|
भीड़ नहीं लगती है मुझे लुभावनी या चित्ताकर्षक,
सिर्फ रात्रि का नीरव श्रृंगार, पता नहीं क्यों अच्छा लगता है|
मुखोटे ओढ़े लोगो की हंसी मुझे नहीं है भाती,
गरीब असहायों का करुण रुदन, पता नहीं क्यों अच्छा लगता है|
बहुत ऊपर उठने की मुझे अब चाह नहीं,
अगर अपने साथ खुद की आत्मा को उठा लू तो अच्छा लगता है|
कलियुग की माया मेरे हृदय पर कुछ असर नहीं करती,
अगर कलियुग के लोगो में मानवता जगा दू तो अच्छा लगता है||
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