जीवन के एकाकीपन में अब जीवन की परिभाषा बन गयी हो तुम,
सोयी आँखों में मधुर स्वप्न की अभिलाषा बन गयी हो तुम।
माना नहीं हो तुम मेरे प्रत्यकछ ,परोक्ष ही सही,
हर प्रहर मेरी साँसों का स्पंदन बन गयी हो तुम ।।
हू अभी मै अकेला ,पर अकेलापन लगता नहीं,
खुद को देखता हू तो लगता है मुझी में समां गयी हो तुम।
कभी खामोश रहता हू तो भी ऐसा आभास होता है ,
हवा की सनसनाहट से के, मुझसे बात कर रही हो तुम।
ख्वाबों के हिरण मन में मेरे कुलाचे भर रहे है अब,
है बड़े आतुर वो तुम्हे छूने के लिए।
वक़्त बन गया है जैसे शत्रु , आगे बढ़ता नहीं,
मुझे और प्रतीक्षा करने को क्यों कह रही हो तुम।
कभी देखा है धूप में अस्तित्व से परछाई का बिछोह ,
कभी देखा है बहती नदी को बिना किनारों के,
तुम्हारे बिन अब मेरी परिभाषा नहीं पूरी,
मेरे अधूरी परिभाषा की पूर्ण भाषा बन गयी हो तुम।।
सोयी आँखों में मधुर स्वप्न की अभिलाषा बन गयी हो तुम।
माना नहीं हो तुम मेरे प्रत्यकछ ,परोक्ष ही सही,
हर प्रहर मेरी साँसों का स्पंदन बन गयी हो तुम ।।
हू अभी मै अकेला ,पर अकेलापन लगता नहीं,
खुद को देखता हू तो लगता है मुझी में समां गयी हो तुम।
कभी खामोश रहता हू तो भी ऐसा आभास होता है ,
हवा की सनसनाहट से के, मुझसे बात कर रही हो तुम।
ख्वाबों के हिरण मन में मेरे कुलाचे भर रहे है अब,
है बड़े आतुर वो तुम्हे छूने के लिए।
वक़्त बन गया है जैसे शत्रु , आगे बढ़ता नहीं,
मुझे और प्रतीक्षा करने को क्यों कह रही हो तुम।
कभी देखा है धूप में अस्तित्व से परछाई का बिछोह ,
कभी देखा है बहती नदी को बिना किनारों के,
तुम्हारे बिन अब मेरी परिभाषा नहीं पूरी,
मेरे अधूरी परिभाषा की पूर्ण भाषा बन गयी हो तुम।।
