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Sunday, May 10, 2015

वही प्रारब्ध होगा

निर्वात का स्पंदन, भावों का मंथन
प्राण वायु की मलंगता, स्मृत्य की प्रचंडता
निष्क्रिय सी हो गयी है, स्वयं में ही खो गयी है
शुसुम्न अवस्था में लिप्त, परजीव सी हो गयी है
अर्ध भाव सा, अल्प विराम सा
अर्ध पूर्ण सा, अर्ध रिक्त सा
जीवन का ये आनंद, विछोह के अंधकार में
सुप्त सा हो गया है, व्यर्थ सा हो गया है
नवीन प्राण वायु की अभिलाषा, तुम से सहचार होने की आशा
है यही बस उपाय अब, तभी चेतन होगा सब
फिर वही उन्माद होगा, प्रेम का आह्लाद होगा
फिर वही सुकून होगा, और वही प्रारब्ध होगा.

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